भारत में परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को संसद से पारित कराने के लिए सरकार को साधारण बहुमत नहीं, बल्कि दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह एक संवैधानिक संशोधन से जुड़ा हुआ विषय है। ऐसे विधेयकों को पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी होती है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है।
वर्तमान में सत्तारूढ़ गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को लोकसभा में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति जरूर हासिल है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत तक पहुँचना अभी भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। वहीं राज्यसभा में संख्या बल की स्थिति और भी संवेदनशील है, जहाँ सरकार को विपक्ष और क्षेत्रीय दलों के सहयोग की आवश्यकता पड़ सकती है।
राजनीतिक दलों के बीच मतभेद, राज्यों के हितों को लेकर आशंकाएँ और परिसीमन से संभावित सीटों के बदलाव जैसे मुद्दे इस विधेयक के रास्ते में बड़ी बाधा बनकर उभर रहे हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह संवाद और सहमति के माध्यम से अधिकतम समर्थन जुटाए, तभी परिसीमन विधेयक को संसद से पारित कराना संभव हो पाएगा।
परिसीमन विधेयक क्या है?
परिसीमन विधेयक का मुख्य उद्देश्य भारत में लोकसभा (Lower House) और राज्यसभा (Upper House) की सीटों के वितरण और सीमाओं को संशोधित करना है, खासकर जनसंख्या के आधार पर। यह विधेयक संविधान (131वें संशोधन) के तहत पेश किया गया है, जिसमें लोकसभा की सीटों को बढ़ाने और महिला आरक्षण को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। इस विधेयक के साथ यह प्रस्ताव भी जोड़ा गया कि लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 तक किया जाए।

दो-तिहाई बहुमत के नियम
संवैधानिक संशोधन विधेयक को संसद में पास कराने के लिए आवश्यक है कि सदन के कुल सदस्यों में से दो-तिहाई बहुमत मौजूद और वोटिंग में शामिल सदस्य इसे समर्थन दें। अगर सभी सदस्य मौजूद हों, तो:
- लोकसभा में 543 सदस्यों में से लगभग 360 वोटों की आवश्यकता होती है।
- राज्यसभा में अगर सभी मौजूद हों, तो लगभग 163 वोटों की जरूरत होती है।
यह नियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत लागू होता है और यह सुनिश्चित करता है कि संवैधानिक मुद्दों पर विस्तृत समर्थन हो।
| सदन | कुल सदस्य संख्या | दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक वोट | विवरण |
|---|---|---|---|
| लोकसभा | 543 | लगभग 360 वोट | संविधान संशोधन जैसे विधेयकों को पारित कराने के लिए लोकसभा में कुल सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। सभी सांसदों की मौजूदगी की स्थिति में यह आंकड़ा करीब 360 तक पहुंचता है। |
| राज्यसभा | 245 | लगभग 163 वोट | यदि राज्यसभा में सभी सदस्य उपस्थित हों, तो दो-तिहाई बहुमत के लिए करीब 163 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। |
लोकसभा में एनडीए की स्थिति
2024 के आम चुनावों के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की स्थिति लोकसभा में मजबूत तो है, लेकिन परिसीमन विधेयक जैसे संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए यह अभी भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। वर्तमान में NDA के पास लोकसभा में लगभग 293 सांसद हैं। जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए कुल 543 सदस्यों वाली लोकसभा में करीब 360 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। इस लिहाज़ से NDA अभी लगभग 67 वोट पीछे है, बशर्ते सभी सांसद सदन में मौजूद हों और मतदान करें।

हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों का असर संख्या बल पर पड़ा है। खास तौर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना में हुए आंतरिक विभाजन के बाद कुछ सांसदों ने NDA को समर्थन देने के संकेत दिए हैं।
इससे सरकार को सीमित राहत जरूर मिली है, लेकिन यह समर्थन अभी निर्णायक स्तर तक नहीं पहुँचा है। ऐसे में लोकसभा में मजबूत दिखने के बावजूद NDA को परिसीमन विधेयक के लिए अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है।
विपक्ष का प्रभाव
परिसीमन विधेयक को लेकर संसद में विपक्ष की भूमिका बेहद निर्णायक मानी जा रही है। विपक्ष में गठित INDIA ब्लॉक के साथ-साथ कई प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों ने सरकार के प्रस्ताव का खुला विरोध करने का ऐलान किया है। इनमें कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसे दल शामिल हैं। इन पार्टियों के पास लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पर्याप्त संख्या में सांसद हैं, जो मिलकर किसी भी संवैधानिक संशोधन विधेयक को रोकने की क्षमता रखते हैं।
विपक्ष का विरोध केवल कानूनी या तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि परिसीमन से देश के अलग-अलग क्षेत्रों पर असमान प्रभाव पड़ सकता है। खासकर दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उनकी राजनीतिक भागीदारी कमजोर हो सकती है। इसके अलावा, कई सामाजिक समूहों और राज्यों का मानना है कि यह प्रक्रिया संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
इसी कारण विपक्ष एकजुट होकर इस विधेयक के खिलाफ रणनीति बना रहा है। मौजूदा हालात में विपक्ष की मजबूत संख्या और साझा रुख सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
दो-तिहाई बहुमत के लिए संभावित समर्थन
अगर NDA कुछ बागी सांसदों या निर्दलीयों का समर्थन प्राप्त कर लेता है, तो बहुमत का आंकड़ा बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए:
- अगर कुछ तृणमूल के बागी सांसद NDA के समर्थन में आ जाते हैं तो यह संख्या बढ़ सकती है।
- वहीं, अगर डीएमके (DMK) समेत कुछ अन्य दल समर्थन देते हैं या वोट से दूर रहते हैं, तो भी संख्या थोड़ी कम या अधिक हो सकती है।
हालांकि यह समर्थन स्थिर नहीं दिख रहा है और कई पार्टियां अभी भी विरोध में हैं।
अप्रैल 2026 का वोटिंग परिणाम
अप्रैल 2026 में आयोजित संसद के विशेष सत्र के दौरान सरकार ने महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को पारित कराने का प्रयास किया था। हालांकि, लोकसभा में हुए मतदान के दौरान यह प्रस्ताव आवश्यक दोहरे बहुमत को हासिल नहीं कर सका और अंततः गिर गया। इस वोटिंग में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने एकजुट होकर विधेयक का विरोध किया।
इस मतदान परिणाम ने साफ संकेत दिया कि सरकार को संवैधानिक संशोधन जैसे अहम विधेयकों के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। खासतौर पर तब, जब विपक्ष पूरी मजबूती के साथ एकजुट नजर आया। यह स्थिति दर्शाती है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए आसान नहीं है। अप्रैल 2026 का यह वोटिंग परिणाम आने वाले समय में सरकार की रणनीति और विपक्ष की भूमिका, दोनों के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राज्यसभा में स्थिति
राज्यसभा में भी NDA की स्थिति मजबूत है, लेकिन फिर भी वह दो-तिहाई बहुमत से थोड़ी दूरी पर है। फिलहाल वहाँ NDA के पास लगभग 114 सांसद हैं, जबकि विपक्ष लगभग 30 सांसदों के साथ कमजोर स्थिति में है। अगर कुछ अन्य सहयोगी दलों का समर्थन भी जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या बढ़ सकती है, लेकिन फिर भी वह आवश्यक दो-तिहाई से कुछ आगे नहीं है।
राज्यसभा में उम्मीद जताई जा रही है कि अगर कुछ निर्दलीय और छोटे सहयोगी दल समर्थन दे दें, तो NDA की स्थिति और मजबूत हो सकती है।
डीएमके और दक्षिण भारतीय दलों की भूमिका
परिसीमन विधेयक को लेकर दक्षिण भारतीय दलों ने कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। खास तौर पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) इस विरोध की अगुवाई करती नजर आई है। पार्टी प्रमुख एम. के. स्टालिन ने सार्वजनिक मंचों से विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि यह संघीय संतुलन और क्षेत्रीय न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है। उनके इस रुख को तमिलनाडु समेत अन्य दक्षिणी राज्यों में व्यापक समर्थन मिला।

दक्षिण भारतीय दलों की मुख्य चिंता यह है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को परिसीमन के बाद नुकसान उठाना पड़ सकता है। उनका तर्क है कि यदि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ, तो उत्तर भारत की सीटें बढ़ेंगी और दक्षिण भारत की राजनीतिक हिस्सेदारी घट सकती है। इसी आशंका के चलते DMK और अन्य क्षेत्रीय दल इस विधेयक के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठा रहे हैं, जिससे सरकार के लिए सहमति बनाना और चुनौतीपूर्ण हो गया है।
विधेयक का राजनीतिक महत्व
परिसीमन विधेयक का राजनीतिक महत्व केवल संसदीय सीटों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक शक्ति के वितरण और भविष्य की चुनावी रणनीतियों पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विधेयक लागू होता है, तो जनसंख्या के आधार पर सीटों में बदलाव से उत्तर भारत के राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ सकती है, जबकि दक्षिण और कुछ अन्य क्षेत्रों का प्रभाव तुलनात्मक रूप से घटने की आशंका है।
यही कारण है कि यह मुद्दा केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहराई से राजनीतिक बन गया है। कई राजनीतिक दल इसे संघीय ढांचे और क्षेत्रीय न्याय से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं कुछ दल इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को जनसंख्या के अनुरूप बनाने की दिशा में जरूरी कदम मानते हैं।
इस विधेयक को लेकर राजनीतिक विचार स्पष्ट रूप से विभाजित हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने हितों को ध्यान में रखते हुए रणनीति बना रहे हैं। आने वाले समय में यह विधेयक भारतीय राजनीति की दिशा और शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला अहम मुद्दा बन सकता है।
संभावित सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव
सकारात्मक असर
- परिसीमन विधेयक लागू होने से चुनावी परिसीमन नवीनतम जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर किया जा सकेगा, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया अधिक समसामयिक बनेगी।
- सीटों का पुनर्वितरण आधुनिक और अद्यतन डेटा पर आधारित होगा, जिससे संसद में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व बेहतर हो सकता है।
- तेजी से बढ़ती आबादी वाले क्षेत्रों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने से नीतिगत फैसलों में उनकी आवाज़ मजबूत हो सकती है।
- लंबी अवधि में यह प्रक्रिया चुनावी असमानताओं को कम करने में सहायक मानी जा सकती है।
नकारात्मक असर
- दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को आशंका है कि उन्हें संसदीय सीटों की कमी झेलनी पड़ सकती है।
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को नुकसान महसूस हो सकता है, जिससे नीतिगत असंतोष बढ़ेगा।
- क्षेत्रीय दलों को राजनीतिक रूप से कमजोर होने का डर है, जिससे राजनीतिक तनाव और विरोध की स्थिति बन सकती है।
- संघीय संतुलन को लेकर विवाद गहराने की संभावना भी बनी रह सकती है।
क्या विधेयक दोबारा पेश किया जाएगा?
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सरकार इस विधेयक को फिर से पेश कर सकती है, लेकिन उसने अपनी रणनीति बदलनी होगी और विपक्षी दलों का समर्थन हासिल करना होगा। कुछ प्रस्तावों में कहा गया है कि विधेयक में संशोधन कर राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है, जिससे समर्थन बढ़ सके।

एनडीए की चुनौती
वर्तमान समीकरण के हिसाब से एनडीए दो-तिहाई बहुमत से काफी दूर है, खासकर जब सभी विपक्षी पार्टियां मजबूत रुख अपनाती हैं। हालांकि कुछ समय में समीकरण बदल सकता है, फिलहाल इस विधेयक को पारित करना आसान नहीं दिखता। NDA को नए समर्थन की तलाश करनी होगी या रणनीति बदलनी होगी ताकि वह मात्रा में आवश्यक बहुमत हासिल कर सके।
FAQs
1. परिसीमन विधेयक क्या है?
उत्तर – यह विधेयक संसद के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सांख्यिकीय प्रतिनिधित्व को संशोधित करने की कोशिश करता है।
2. यह विधेयक संविधान संशोधन क्यों है?
उत्तर – क्योंकि यह संविधान (131वां संशोधन) के तहत संसद की संरचना व सीटें बदलने का प्रस्ताव रखता है।
3. दो-तिहाई बहुमत क्या होता है?
उत्तर – यह वह संख्या है जिसमें सदन के कुल सदस्यों में से दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है।
4. लोकसभा में एनडीए के पास कितनी सीटें हैं?
उत्तर – NDA के पास लगभग 293 सीटें हैं।
5. विधेयक पास होने के लिए लोकसभा में कितने वोट चाहिए?
उत्तर – लगभग 360 वोट चाहिए यदि सभी सदस्य मौजूद और मतदान कर रहे हों।
6. राज्यसभा में एनडीए की स्थिति कैसी है?
उत्तर – राज्यसभा में NDA के पास लगभग 114 सांसद हैं, जो दो-तिहाई बहुमत से दूर हैं।
7. विपक्ष ने विरोध क्यों किया?
उत्तर – विपक्ष का मानना है कि यह विधेयक लाभार्थी शक्ति संतुलन बदल सकता है और क्षेत्रीय दलों की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
8. विधेयक फिर से पेश किया जाएगा?
उत्तर – संभावना है, लेकिन इसके लिए समर्थन जुटाना आवश्यक है।
9. यह विधेयक तत्काल लागू हो सकता है?
उत्तर – अब तक इसे पारित नहीं किया गया है, इसलिए लागू नहीं हो सकता है।
10. क्या कांग्रेस इसका समर्थन करेगी?
उत्तर – कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इसे रोकने की रणनीति बना रहे हैं।
11. विधेयक के लागू होने पर बैठकों में बदलाव क्या होगा?
उत्तर – सीटों के वितरण में बदलाव हो सकता है और नए चुनावी समीकरण बन सकते हैं।
12. क्या सरकार के पास पर्याप्त वोट हैं?
उत्तर – वर्तमान में नहीं, उन्हें अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता है।
13. यह विधेयक महिलाओं के आरक्षण से क्यों जुड़ा था?
उत्तर – सरकार ने महिला आरक्षण को विधेयक में जोड़कर समर्थन बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन वह रणनीति सफल नहीं रही।