Election Commission News : SIR विवाद के बाद चुनाव आयोग का भरोसा जीतने का मिशन, शुरू की नई पहल

Election Commission News – SIR विवाद के बाद चुनाव आयोग का भरोसा जीतने का मिशन

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने शुक्रवार (17 जुलाई) को स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग द्वारा चलाया जा रहा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान मूल रूप से मतदाता सूची का अद्यतन करने और नागरिकता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप पात्र मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि आयोग केवल ऐसे मतदाताओं की पहचान कर रहा है जो अब संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में नहीं रहते, स्थानांतरित हो चुके हैं, जिनका निधन हो चुका है, जिनके नाम दोहराए गए हैं या जो किसी अन्य कारण से मतदान के पात्र नहीं हैं।

नई दिल्ली में आयोजित भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन को संबोधित करते हुए ज्ञानेश कुमार ने देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए 380 से अधिक मीडिया प्रतिनिधियों से कहा कि यह अभियान पूरी तरह संविधान और चुनावी कानूनों के अनुरूप संचालित किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया सीधे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 से जुड़ी है। इस अनुच्छेद के अनुसार केवल वही व्यक्ति मतदान का अधिकार रखता है जो भारत का नागरिक हो, जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक हो और जो संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी (Ordinarily Resident) हो।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने जोर देकर कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का उद्देश्य किसी पात्र मतदाता का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और अद्यतन बनाना है, ताकि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता बनी रहे।

SIR का उद्देश्य सिर्फ अपात्र मतदाताओं की पहचान, पात्र वोटरों का नाम नहीं हटेगा

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) सीधे तौर पर नागरिकता और संविधान में निर्धारित मतदान की पात्रता से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मतदान का अधिकार पाने के लिए तीन मूल शर्तें तय की गई हैं—पहली, व्यक्ति भारत का नागरिक हो; दूसरी, उसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक हो; और तीसरी, वह संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी (Ordinarily Resident) हो। चुनाव आयोग का दायित्व है कि मतदाता सूची इन सभी संवैधानिक मानकों का पूरी तरह पालन करे।

ज्ञानेश कुमार ने उन आरोपों को भी खारिज किया कि SIR अभियान का उद्देश्य योग्य मतदाताओं के नाम हटाना है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया केवल उन नामों की पहचान और हटाने के लिए चलाई जा रही है जो अब मतदान के पात्र नहीं हैं।

उन्होंने बताया कि आयोग का लक्ष्य केवल ASDTF श्रेणी के मतदाताओं की पहचान करना है। इसमें Absent (अनुपस्थित), Shifted (स्थानांतरित), Dead (मृत), Duplicate (डुप्लिकेट) और Transferred/Foreign (स्थायी रूप से विदेश चले गए या अन्य स्थान पर स्थानांतरित) मतदाता शामिल हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने जोर देकर कहा कि इन श्रेणियों को छोड़कर बाकी सभी पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है, ताकि चुनाव निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप कराए जा सकें।

विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर उठे राजनीतिक विवाद के बाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने अपनी विश्वसनीयता मजबूत करने और जनता के बीच भरोसा बढ़ाने के उद्देश्य से व्यापक जनसंपर्क अभियान शुरू किया है। आयोग ने कई नई डिजिटल पहल की घोषणा की है, मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों को दोबारा सक्रिय करने की योजना बनाई है और पहली बार देशभर के 350 से अधिक पत्रकारों की मौजूदगी में राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन आयोजित किया।

यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब निर्वाचन आयोग हाल के वर्षों में अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का सामना कर रहा है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को आयोग ने मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाने की नियमित प्रक्रिया बताया है, लेकिन विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इसके जरिए योग्य मतदाताओं के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा सकते हैं और दस्तावेजों की प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से जटिल बनाया जा रहा है।

इन आरोपों के चलते कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए, अदालतों में याचिकाएं दायर की गईं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर व्यापक राजनीतिक बहस छिड़ गई। हालांकि, आयोग ने लगातार इन सभी आरोपों को खारिज किया है और स्पष्ट किया है कि पूरी प्रक्रिया संविधान और चुनावी कानूनों के अनुरूप संचालित की जा रही है।

निर्वाचन आयोग के अधिकारियों का कहना है कि किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत पर्याप्त अवसर दिया जाता है। यदि किसी का नाम सूची से हटता भी है, तो संबंधित व्यक्ति के पास अपील करने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कर अपना नाम दोबारा शामिल कराने का पूरा अधिकार होता है। आयोग का कहना है कि नई डिजिटल सुविधाओं और जागरूकता अभियानों के माध्यम से मतदाताओं तक सही जानकारी पहुंचाई जाएगी, ताकि भ्रम की स्थिति दूर हो और चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास और अधिक मजबूत हो।

पुराने मतदाताओं को दस्तावेज़ देने की जरूरत नहीं, नए मतदाताओं के लिए भी मिलेगी राहत

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि सभी मतदाताओं को नए सिरे से दस्तावेज़ जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। उन्होंने बताया कि जिन लोगों के नाम 2002, 2003 या 2004 की मतदाता सूची में पहले से दर्ज हैं, उन्हें सामान्यतः कोई अतिरिक्त दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं करना पड़ेगा। इन वर्षों की मतदाता सूची में नाम होना उनके मतदान अधिकार की निरंतरता का प्रमाण माना जाएगा।

उन्होंने यह भी बताया कि 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे नागरिकों के लिए भी प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास किया गया है। यदि उनके माता-पिता के नाम पहले की मतदाता सूचियों में दर्ज हैं, तो यह जानकारी नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत उनकी पात्रता स्थापित करने में सहायक हो सकती है। ऐसे मामलों में अतिरिक्त दस्तावेज़ों की आवश्यकता काफी कम हो जाएगी।

ज्ञानेश कुमार ने कहा कि चुनाव आयोग का उद्देश्य पात्र मतदाताओं पर अनावश्यक दस्तावेज़ी बोझ डालना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को सटीक और अद्यतन बनाए रखना है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि पूरी प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों के अनुसार पारदर्शी तरीके से पूरी की जाएगी और पात्र मतदाताओं के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

संविधान और चुनावी कानूनों के तहत होती है पूरी चुनाव प्रक्रिया : CEC

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने कहा कि भारत में चुनाव पूरी तरह संविधान और चुनावी कानूनों के अनुसार संचालित होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया का हर चरण भारतीय संविधान, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तथा निर्वाचन आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही पूरा किया जाता है। उन्होंने कहा कि कोई भी चुनावी कार्रवाई इन कानूनी प्रावधानों से बाहर नहीं होती और यही सिद्धांत देश के प्रत्येक चुनाव अधिकारी के लिए मार्गदर्शक है।

ज्ञानेश कुमार ने बताया कि भारत की मतदाता सूची, जिसमें लगभग 95 करोड़ मतदाता शामिल हैं, एक “जीवंत दस्तावेज़ (Living Document)” है। इसका अर्थ है कि यह सूची समय-समय पर लगातार अपडेट होती रहती है। हर वर्ष लगभग 8 प्रतिशत प्रविष्टियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने तथा आवश्यक सुधार करने जैसे बदलाव किए जाते हैं, ताकि मतदाता सूची सटीक और अद्यतन बनी रहे।

उन्होंने यह भी बताया कि मतदाता सूची तैयार करने और उसके सत्यापन की प्रक्रिया में 12 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारी (BLO) सक्रिय रूप से काम करते हैं। इसके अलावा, मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त 15 लाख से अधिक बूथ लेवल एजेंट (BLA) भी इस प्रक्रिया में भाग लेते हैं। उनके अनुसार, BLO और BLA की संयुक्त भागीदारी से मतदाता सूची की जांच कई स्तरों पर होती है, जिसे उन्होंने “समवर्ती ऑडिट (Concurrent Audit)” की व्यवस्था बताया। इससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।

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