Sarthak Sidhant Procurement Portal Launch
2026 में शिक्षा जगत से जुड़ी एक असाधारण और प्रेरणादायक घटना ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। एक साधारण 12वीं कक्षा के छात्र सार्थक सिद्धांत (Sarthak Sidhant) ने अपनी असाधारण समझ, विश्लेषण क्षमता और तकनीकी कौशल के दम पर सरकारी तंत्र में पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा कदम उठाया। इससे पहले वे सीबीएसई से जुड़े एक टेंडर में पाई गई विसंगतियों को उजागर कर चुके थे, जिससे वे चर्चा में आए। अब उन्होंने एक सार्वजनिक गवर्नमेंट प्रोक्योरमेंट पोर्टल लॉन्च किया है, जिसमें लगभग 1.66 करोड़ (166 लाख) सरकारी खरीद से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराए गए हैं।
इस पोर्टल का मुख्य उद्देश्य सरकारी खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। आम नागरिक, शोधकर्ता, पत्रकार, नीति विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन इस प्लेटफॉर्म के जरिए सरकारी खर्च, टेंडर, सप्लायर और खरीद से जुड़े डेटा को आसानी से देख, डाउनलोड और विश्लेषण कर सकते हैं। सार्थक का मानना है कि जब डेटा जनता के लिए खुला होगा, तो अनियमितताओं पर निगरानी आसान होगी और जवाबदेही बढ़ेगी। यह पहल न केवल डिजिटल पारदर्शिता को बढ़ावा देती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि युवा सोच और सही दिशा में किया गया प्रयास व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
पोर्टल का महत्व और लक्ष्य
Sidhant ने अपने पोर्टल के बारे में कहा कि:
“Transparency needs to be accessible. From today, it is.”
यह पोर्टल सरकार के Central Public Procurement (CPP) Portal से स्क्रैप किए गए डेटा का संग्रह है, जिसे उन्होंने आम लोगों की पहुंच के लिए बेहतर तरीके से उपलब्ध कराया है।
उनका मानना है कि इस तरह का खुला डेटा खोजकर्ता, पत्रकार, समाजसेवी समूह और तकनीकी संस्थान सरकारी खर्चों, निविदा प्रक्रियाओं और खरीद शर्तों की जांच में उपयोग कर सकते हैं, जिससे सरकारी संचालन में जवाबदेही और उत्तरदायित्व मजबूत होगा।
यह यात्रा कैसे शुरू हुई?
यह यात्रा तब शुरू हुई जब सार्थक सिद्धांत ने अपनी CBSE कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर गहराई से सोचने का निर्णय लिया। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद, जब उन्हें उत्तरपुस्तिकाओं के डिजिटल स्कैन उपलब्ध कराए गए, तो उन्होंने इन्हें अपने द्वारा लिखे गए वास्तविक उत्तरों से सावधानीपूर्वक मिलाया। इस तुलना के दौरान उन्होंने पाया कि कुछ स्थानों पर अंक, टिप्पणियाँ और मूल्यांकन से जुड़े आंकड़े पूरी तरह मेल नहीं खा रहे थे। यह अंतर सामान्य त्रुटि से कहीं अधिक प्रतीत हो रहा था और इसी बिंदु से उनके मन में सवाल उठने लगे।


जैसे-जैसे यह मुद्दा सामने आया, कई अन्य छात्रों ने भी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली (On-Screen Marking – OSM) को लेकर अपनी शंकाएँ व्यक्त कीं। छात्रों की इन प्रतिक्रियाओं ने सार्थक को और गहराई से जांच करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने केवल व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित न रहते हुए, CBSE से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड, टेंडर दस्तावेज़ और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध निविदाओं का अध्ययन शुरू किया।
उन्होंने अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त दस्तावेज़ों की तुलना की, तकनीकी प्रक्रियाओं को समझा और यह जानने का प्रयास किया कि मूल्यांकन प्रणाली वास्तव में कैसे काम करती है। इस विश्लेषण के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े होते थे। यहीं से सार्थक की यात्रा एक छात्र की जिज्ञासा से आगे बढ़कर, सरकारी प्रणालियों में पारदर्शिता लाने के मिशन में बदल गई।
OSM प्रणाली, टेंडर और राज्य का विश्लेषण
अपने गहन अध्ययन के दौरान सार्थक सिद्धांत ने CBSE की On-Screen Marking (OSM) प्रणाली से जुड़े टेंडर दस्तावेज़ों का विस्तार से विश्लेषण किया। इस जांच में यह बात बार-बार सामने आई कि OSM के लिए जारी की गई निविदाओं में समय-समय पर कई अहम संशोधन किए गए थे। इन बदलावों में पात्रता शर्तों, तकनीकी प्रदर्शन मानकों, अनुभव की आवश्यकताओं और प्रमाणीकरण (certification) से जुड़े नियमों को बदला जाना शामिल था।

Sidhant के अनुसार, इतनी बार और इतने महत्वपूर्ण संशोधन यह संकेत देते हैं कि निविदा प्रक्रिया पूरी तरह स्थिर और पारदर्शी नहीं रही। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या ये परिवर्तन केवल तकनीकी जरूरतों के कारण किए गए थे या फिर इनका उद्देश्य किसी खास सेवा प्रदाता को अनुकूल स्थिति में लाना था। उनके विश्लेषण में यह भी सामने आया कि संशोधित शर्तों के बाद प्रतिस्पर्धा का दायरा सीमित हो सकता था। इसी वजह से उन्होंने निष्पक्षता, जवाबदेही और सरकारी टेंडर प्रक्रियाओं में पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
संसद में प्रस्तुति
यह छात्र केवल ऑनलाइन पोस्ट तक सीमित नहीं रहा। उसने अपनी खोज और निष्कर्ष को Parliamentary Standing Committee on Education के सामने भी रखा। इस समिति में उन्होंने अपने विश्लेषण को प्रस्तुत किया और डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली के कार्यान्वयन और उसके प्रक्रिया संबंधी शंकाओं को उठाया।
समिति में गुरिल्ला विधि से कई प्रक्रियात्मक दलीलों को रखा गया, जैसे:
- कुछ निविदा शर्तों को संशोधित किया गया
- “Poor performance” या “blacklisting” जैसे क्लॉज़ हटाए गए
- नए दस्तावेज़ों में कुछ आवश्यक तकनीकी मानकों में बदलाव किए गए
यह सभी मुद्दे उन्होंने दस्तावेज़ों के विस्तृत विश्लेषण से उजागर किए।
खुला डेटाबेस (Open Database): एक पारदर्शिता प्रयास
अब Sarthak ने जो प्रोक्योरमेंट पोर्टल लॉन्च किया है, वह सरकारी क्रियाओं की एक बड़ी डेटा प्लेटफ़ॉर्म की तरह काम करेगा, जिसमें लोग:
- वास्तविक सरकारी खरीद या करारों का डेटा देख सकते हैं
- रिकॉर्ड डाउनलोड करके खुद ही विश्लेषण कर सकते हैं
- सरकारी खर्च और टेंडर प्रक्रियाओं की पारदर्शिता को बढ़ावा दे सकते हैं
इस पहल का मूल उद्देश्य यह है कि “डेटा को केवल तकनीकी विशेषज्ञों तक ही सीमित न रखा जाए, बल्कि जनता की पहुंच में लाया जाए।”
प्रतिक्रिया, समर्थन और आलोचना
Sidhant की पहल को कई लोगों द्वारा सराहा गया है। यह दिखाता है कि युवा शोधकर्ता भी सरकारी प्रणालियों पर निगरानी कर सकते हैं और सार्वजनिक हित के मुद्दों को उजागर कर सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह सिर्फ आरंभ है और “अभी और भी अधिक प्रकाश डालने के लिए आगे कदम आएंगे।”
साथ ही, यह पहल सरकार, शिक्षा बोर्ड और सार्वजनिक प्रशासन में उत्तरदायित्व और जवाबदेही को लेकर बहस को भी बढ़ावा देती है।
FAQS
1. यह किसने किया और कौन है Sarthak Sidhant?
उत्तर – यह पहल 12वीं के छात्र Sarthak Sidhant द्वारा की गई, जिन्होंने डिजिटल टेंडर और सरकारी डेटा की गहन समीक्षा की।
2. पोर्टल में क्या डेटा उपलब्ध है?
उत्तर – लगभग 1.66 करोड़ सरकारी खरीद (procurement) रिकॉर्ड इसमें सार्वजनिक किए गए हैं।
3. यह डेटा कहाँ से आया?
उत्तर – डेटा भारत सरकार के Central Public Procurement (CPP) Portal से स्क्रैप किया गया है।
4. पोर्टल का उद्देश्य क्या है?
उत्तर – सरकारी खर्च और टेंडर प्रक्रिया को पारदर्शी और सुलभ बनाना है।
5. यह डेटाबेस किसके लिए है?
उत्तर – यह नागरिक, पत्रकार और शोधकर्ता सभी के लिए है।
6. Sidhant ने यह काम कब किया?
उत्तर – उन्होंने पिछले 2 हफ्तों में डेटा स्क्रैप किया और पोर्टल लॉन्च किया।
7. यह पहल क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है?
उत्तर – यह सरकारी नीतियों और खरीद के पारदर्शिता को जानने का जरिया है।
8. क्या यह पोर्टल सरकारी है?
उत्तर – नहीं, यह निजी पहल है लेकिन सरकारी स्रोत डेटा पर आधारित है।
9. क्या पोर्टल मुफ्त है?
उत्तर – हाँ, यह मुफ्त और सार्वजनिक उपयोग के लिए है।
10. क्या अन्य छात्र भी शामिल हैं?
उत्तर – पोर्टल निर्माण और विश्लेषण में लेखक ने पत्रकारों और तकनीकी सहयोगियों का भी समर्थन लिया है।
11. क्या Sidhant को संसद में बुलाया गया?
उत्तर – हाँ, उन्होंने टेंडर पर अपनी रिपोर्ट Parliamentary Standing Committee के सामने रखी।
12. क्या CBSE ने जवाब दिया?
उत्तर – CBSE ने इस विवाद पर अपने बयान दिए हैं और कहा है कि प्रक्रिया सही थी, पर जांच जारी है।