US Supreme Court Vs Donald Trump
संयुक्त राज्य अमेरिका की न्यायपालिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच बर्थराइट सिटिजनशिप (Birthright Citizenship) को लेकर चल रही बहस ने 2026 की गर्मियों में एक निर्णायक मोड़ ले लिया है। हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 14वीं संशोधन के तहत जन्म के आधार पर नागरिकता के अधिकार को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति, माता-पिता की इमिग्रेशन स्थिति चाहे जो भी हो, नागरिकता का हकदार है। इस फैसले को ट्रम्प प्रशासन के उस आव्रजन एजेंडे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, जो जन्म आधारित नागरिकता की व्याख्या को सीमित करना चाहता था।
यह निर्णय केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी गहरे हैं। समर्थकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की मूल भावना और समान अधिकारों की रक्षा की है, जबकि आलोचक इसे अवैध आव्रजन को प्रोत्साहित करने वाला कदम बता रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में ट्रम्प प्रशासन ने “बर्थ टूरिज़्म (Birth Tourism)” पर कड़ी निगरानी रखने की नीति अपनाने का ऐलान किया है। इसका उद्देश्य उन मामलों पर कार्रवाई करना है, जहां विदेशी नागरिक केवल बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के लिए अमेरिका आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका में आव्रजन नीति को लेकर बहस को और तेज कर दिया है। जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट का फैसला संवैधानिक अधिकारों की मजबूती का प्रतीक माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भविष्य में कांग्रेस या प्रशासन इस नियम में बदलाव की कोशिश करेगा। इस लेख में हम इसी फैसले की पृष्ठभूमि, इसके कानूनी तर्क, ट्रम्प प्रशासन की रणनीति और आने वाले समय में इसके संभावित प्रभावों को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
बर्थराइट सिटिजनशिप (Birthright Citizenship) क्या है?
“बर्थराइट सिटिजनशिप (Birthright Citizenship)” वह संवैधानिक सिद्धांत है जिसके अनुसार जो भी व्यक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका की धरती पर जन्म लेता है, उसे अमेरिकी नागरिकता स्वतः प्राप्त होती है, भले ही उसके माता-पिता की कानूनी या आव्रजन स्थिति कुछ भी हो। इस अधिकार की जड़ें अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन में निहित हैं, जिसे गृहयुद्ध के बाद 1868 में अपनाया गया था। इसका उद्देश्य उस दौर में पूर्व दासों और उनके बच्चों को पूर्ण नागरिक अधिकार देना था।
14वें संशोधन के सिटिजनशिप क्लॉज़ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिक बने सभी व्यक्ति, जो इसके अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, संयुक्त राज्य और जिस राज्य में वे रहते हैं, उसके नागरिक हैं।” इस पंक्ति ने जन्म के आधार पर नागरिकता को एक मजबूत संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की, जिससे सरकार मनमाने ढंग से किसी वर्ग या समुदाय को नागरिकता से वंचित न कर सके।

पिछले एक सदी से भी अधिक समय से बर्थराइट सिटिजनशिप अमेरिकी लोकतंत्र की बुनियाद का हिस्सा रही है। इसे अक्सर “अधिकारों का अधिकार” कहा जाता है, क्योंकि नागरिकता मिलने के साथ ही व्यक्ति को शिक्षा, स्वास्थ्य, मतदान (उम्र पूरी होने पर) और कानूनी संरक्षण जैसे बुनियादी अधिकार प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि यह सिद्धांत न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक समानता का भी प्रतीक माना जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि जन्म के आधार पर किसी बच्चे के भविष्य पर सवाल न उठे।
बर्थराइट सिटिजनशिप खत्म करने की कोशिश
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही बर्थराइट सिटिजनशिप को लेकर बड़ा कदम उठाने की कोशिश की। उन्होंने पहले ही दिन एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) जारी किया, जिसका उद्देश्य 14वें संशोधन की पारंपरिक व्याख्या को बदलना था। इस आदेश के तहत ऐसे बच्चों को अमेरिकी नागरिकता न देने का प्रस्ताव रखा गया, जिनके माता-पिता या तो अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे हों या अस्थायी वीज़ा पर मौजूद हों।
ट्रम्प और उनके समर्थकों का दावा था कि जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता ने अवैध आव्रजन को बढ़ावा दिया है। उनका यह भी तर्क था कि “बर्थ टूरिज़्म” एक गंभीर समस्या बन चुका है, जिसमें कुछ विदेशी महिलाएं जानबूझकर अमेरिका आकर बच्चों को जन्म देती हैं, ताकि उनके बच्चे को स्वतः नागरिकता मिल सके। ट्रम्प प्रशासन के अनुसार, इससे आव्रजन प्रणाली पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और इसका दुरुपयोग होता है।
हालांकि, इस कार्यकारी आदेश को तुरंत कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान में बदलाव करने जैसा प्रयास मानते हुए असंवैधानिक करार दिया। अदालत का कहना था कि राष्ट्रपति के पास कार्यकारी आदेश के जरिए 14वें संशोधन के स्पष्ट प्रावधानों को बदलने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला – 6–3 से बर्थराइट सिटिजनशिप को बरकरार
30 जून 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए 6–3 के बहुमत से बर्थराइट सिटिजनशिप को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि 14वीं संशोधन के तहत अमेरिका में जन्म लेने वाला हर बच्चा नागरिक है, चाहे उसके माता-पिता का इमिग्रेशन स्टेटस कुछ भी हो। इस फैसले के साथ ही ट्रम्प प्रशासन द्वारा जारी वह कार्यकारी आदेश रद्द कर दिया गया, जिसे असंवैधानिक माना गया।
मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स की अगुवाई में दिए गए फैसले में कहा गया कि संविधान की भाषा बिल्कुल स्पष्ट है और उसकी व्याख्या को राष्ट्रपति के आदेश से बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि “संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में जन्मा हर व्यक्ति जन्म से नागरिक है,” और इसमें किसी प्रकार का अपवाद जोड़ना संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा।
अदालत ने यह भी माना कि बर्थराइट सिटिजनशिप अमेरिकी लोकतंत्र और समानता के सिद्धांतों की रीढ़ है। यह नियम यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी बच्चे को माता-पिता की स्थिति के कारण भेदभाव का सामना न करना पड़े। फैसले में यह भी रेखांकित किया गया कि अगर इस प्रावधान में बदलाव करना है, तो उसका एकमात्र रास्ता संविधान संशोधन है, न कि कार्यकारी आदेश।
इस निर्णय को आव्रजन अधिकार समर्थकों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है, जबकि ट्रम्प समर्थकों के लिए यह एक कानूनी और राजनीतिक झटका है। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अमेरिकी संविधान की स्थिरता और सर्वोच्चता को एक बार फिर मजबूत किया है।
ट्रम्प का जवाब – कांग्रेस के जरिए बदलाव की कोशिश
फैसले के बाद ट्रम्प ने इसे “देश के लिए बुरा” कहा और कहा कि अब कांग्रेस को कानून बनाकर इस विषय पर काम करना चाहिए।
हालांकि संविधान संशोधित करने का रास्ता बेहद कठिन है (दो-तिहाई सदस्यों की मंज़ूरी चाहिए), ट्रम्प ने सुझाव दिया है कि कांग्रेस कुछ कानूनी अपवाद बना सकती है — जो केवल नागरिकता को उन बच्चों तक सीमित करेगा जिनके माता-पिता देश में स्थायी कानूनी स्थिति रखते हैं।

लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कानून भी पास होना आसान नहीं है क्योंकि इसे फिलिबस्टर रूल (60 वोट) से पार होना पड़ेगा।
“बर्थ टूरिज़्म” क्या है और क्यों विवादित?
“बर्थ टूरिज़्म” उस प्रक्रिया को कहा जाता है, जिसमें गर्भवती महिलाएँ जानबूझकर अमेरिका की यात्रा करती हैं ताकि उनके बच्चे का जन्म अमेरिकी धरती पर हो और उसे जन्म के साथ ही अमेरिकी नागरिकता मिल सके। चूंकि अमेरिका में बर्थराइट सिटिजनशिप का सिद्धांत लागू है, इसलिए ऐसे बच्चों को संविधान के तहत स्वतः नागरिकता प्राप्त हो जाती है। यही वजह है कि यह विषय लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
डोनाल्ड ट्रम्प और उनके समर्थकों का मानना रहा है कि बर्थ टूरिज़्म अमेरिकी कानूनों और इमिग्रेशन सिस्टम का “दुरुपयोग” है। उनका तर्क है कि कुछ लोग केवल नागरिकता का लाभ उठाने के लिए अस्थायी रूप से अमेरिका आते हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं, संसाधनों और कानूनी ढांचे पर अनावश्यक दबाव पड़ता है। इसी आधार पर ट्रम्प प्रशासन ने इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की बात कही थी।
हालांकि, कई स्वतंत्र अध्ययनों और विश्लेषणों से पता चलता है कि बर्थ टूरिज़्म के मामले वास्तव में बहुत सीमित हैं। कुल अमेरिकी जन्मों में इसका हिस्सा लगभग 0.5% या उससे भी कम बताया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुद्दे को अक्सर राजनीतिक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि सख्त आव्रजन नीतियों को正 ठहराया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद न्याय विभाग ने संकेत दिया है कि वह बर्थ टूरिज़्म को खत्म करने के बजाय उसे कानूनी दायरे में नियंत्रित करने पर ध्यान देगा। इसमें वीज़ा धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने और संगठित नेटवर्क के खिलाफ जांच व अभियोजन तेज करना शामिल है। इस तरह, बहस अब नागरिकता खत्म करने से हटकर कानून के दुरुपयोग को रोकने पर केंद्रित होती दिख रही है।
सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान क्या कहा गया?
जब बर्थराइट सिटिजनशिप से जुड़ा यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा, तो सुनवाई के दौरान तीखी और व्यापक बहस देखने को मिली। ट्रम्प प्रशासन की ओर से पेश हुए सरकारी वकीलों ने दलील दी कि जन्म के आधार पर नागरिकता देने की मौजूदा व्यवस्था ने “एक विशाल बर्थ टूरिज़्म इंडस्ट्री” को जन्म दिया है। उनके अनुसार, कई विदेशी महिलाएँ केवल इस उद्देश्य से अमेरिका आती हैं कि उनका बच्चा वहां जन्म ले और स्वतः अमेरिकी नागरिक बन जाए। सरकार का तर्क था कि इससे न केवल इमिग्रेशन सिस्टम पर दबाव बढ़ता है, बल्कि यह संविधान की मूल भावना का भी दुरुपयोग है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश न्यायाधीश इस तर्क से सहमत नहीं दिखे। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि 14वीं संशोधन को बहुत सीमित या संकीर्ण तरीके से नहीं पढ़ा जा सकता। उनका कहना था कि इस संशोधन का मूल उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना था कि अमेरिका में जन्म लेने वाले किसी भी बच्चे को नागरिकता और संवैधानिक अधिकारों से वंचित न किया जाए, चाहे उसके माता-पिता की कानूनी स्थिति कुछ भी हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक रूप से यह प्रावधान समानता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया था।
बहस के दौरान कुछ न्यायाधीशों ने यह भी संकेत दिया कि अगर बर्थराइट सिटिजनशिप को लेकर कोई बदलाव करना है, तो वह अदालत का नहीं बल्कि कांग्रेस का काम है। उनके अनुसार, संविधान की व्याख्या को बदलने या नागरिकता के नियमों में संशोधन करने का अधिकार विधायिका के पास है, न कि कार्यकारी आदेश या न्यायिक हस्तक्षेप के जरिए। इस तरह, कोर्ट की टिप्पणियों से साफ हो गया कि न्यायपालिका इस मुद्दे पर संविधान की स्थापित व्याख्या से हटने के पक्ष में नहीं है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
अमेरिका में बर्थराइट सिटिजनशिप पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा हुआ है।
- समर्थक कहते हैं कि यह निर्णय संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है और कोर सिद्धांतों को बनाए रखता है।
- आलोचक कहते हैं कि यह “एक दरवाजा खुला छोड़ देता है” जिसे विदेश से आने वाले लोग फायदा उठा सकते हैं।
- ट्रम्प समर्थक इस फैसले को “कांग्रेस के जरिए बदलने” का आह्वान कर रहे हैं।
युद्ध-पश्चिमी देशों में नागरिकता और आव्रजन नीतियों पर यह बहस US समुदायों के बीच गहरी सरगर्मी पैदा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संवैधानिक आधार
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सीधे तौर पर संविधान के 14वीं संशोधन के सिटिजनशिप क्लॉज़ पर आधारित है। इस क्लॉज़ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो कोई भी संयुक्त राज्य अमेरिका की धरती पर जन्म लेता है और देश के अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) के अधीन है, वह स्वतः अमेरिकी नागरिक माना जाएगा। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रावधान की भाषा जानबूझकर व्यापक रखी गई थी, ताकि किसी भी बच्चे को जन्म के आधार पर नागरिकता से वंचित न किया जा सके।
14वीं संशोधन को 1868 में अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद संविधान में जोड़ा गया था। इसका मुख्य उद्देश्य उन लाखों गुलामों और उनके बच्चों को नागरिकता देना था जिन्हें पहले कानूनन नागरिक नहीं माना जाता था। इस संशोधन के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि नस्ल, वंश या माता-पिता की स्थिति के आधार पर किसी को भी नागरिक अधिकारों से वंचित न किया जाए। समय के साथ यह सिद्धांत अमेरिकी नागरिकता व्यवस्था की रीढ़ बन गया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रम्प प्रशासन का कार्यकारी आदेश इस स्थापित संवैधानिक व्याख्या को बदलने का प्रयास था। लेकिन न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि संविधान की व्याख्या और उसके अर्थ को तय करने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, न कि कार्यपालिका के पास। कोई भी राष्ट्रपति कार्यकारी आदेश के माध्यम से संविधान में निहित अधिकारों को सीमित या पुनर्परिभाषित नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि बर्थराइट सिटिजनशिप में कोई बदलाव करना है, तो इसके लिए संविधान संशोधन या कांग्रेस द्वारा नया कानून आवश्यक होगा। इस तरह, अदालत का निर्णय न केवल बर्थराइट सिटिजनशिप की रक्षा करता है, बल्कि सत्ता के संतुलन और संविधान की सर्वोच्चता के सिद्धांत को भी मजबूत करता है।
क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अर्थ यह है कि बर्थराइट नागरिकता हमेशा सुरक्षित है?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला फिलहाल बर्थराइट सिटिजनशिप के मौजूदा संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है और यह स्पष्ट करता है कि जन्म के आधार पर नागरिकता को कार्यकारी आदेश के जरिए खत्म या सीमित नहीं किया जा सकता। इसका मतलब यह है कि वर्तमान कानूनी ढांचे के तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों का नागरिकता अधिकार सुरक्षित बना हुआ है, चाहे उनके माता-पिता की आव्रजन स्थिति कुछ भी हो।
हालांकि, यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि बर्थराइट नागरिकता अब कभी चुनौती का सामना नहीं करेगी। अदालत के फैसले ने केवल यह तय किया है कि राष्ट्रपति या प्रशासन अकेले इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते। ट्रम्प और उनके समर्थकों ने संकेत दिया है कि वे कांग्रेस के माध्यम से कानून बनाकर इस सिद्धांत को सीमित करने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यहां सबसे बड़ी बाधा संविधान का ढांचा ही है।
बर्थराइट सिटिजनशिप 14वीं संशोधन में निहित है, और इसमें बदलाव करने के लिए या तो संविधान संशोधन की जरूरत होगी या फिर ऐसा कानून लाना होगा जो सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या से टकराता न हो। संविधान संशोधन की प्रक्रिया बेहद कठिन है—इसके लिए कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत और फिर राज्यों की तीन-चौथाई स्वीकृति जरूरी होती है। मौजूदा राजनीतिक माहौल में इतना व्यापक समर्थन जुटाना आसान नहीं है।
इसलिए निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला बर्थराइट नागरिकता को तुरंत और निकट भविष्य में सुरक्षित बनाता है। जब तक देश-भर में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक सहमति नहीं बनती, तब तक इस मूल संवैधानिक अधिकार में बड़े बदलाव की संभावना बेहद कम बनी रहेगी।
बर्थ टूरिज़्म पर DOJ का नया रवैया
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice – DOJ) ने बर्थ टूरिज़्म को लेकर अपने रुख को और सख्त करने का संकेत दिया है। DOJ के अनुसार, अब उन संगठित नेटवर्क्स और व्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जो वीज़ा धोखाधड़ी के जरिए गर्भवती महिलाओं को केवल बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के उद्देश्य से अमेरिका लाने में शामिल हैं।
न्याय विभाग ने साफ किया है कि बर्थराइट सिटिजनशिप को संविधान ने भले ही सुरक्षित रखा हो, लेकिन इसका दुरुपयोग करने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति वीज़ा आवेदन के दौरान झूठी जानकारी देता है, यात्रा के असली उद्देश्य को छुपाता है, या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है, तो उसे संघीय अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में न केवल यात्रा करने वाले व्यक्ति, बल्कि उन्हें सहायता देने वाले एजेंट्स और कंपनियां भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आएंगी।
DOJ का यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार अब नागरिकता के अधिकार और आव्रजन कानूनों के प्रवर्तन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने जन्म के आधार पर नागरिकता को बरकरार रखा है, वहीं दूसरी ओर न्याय विभाग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कानून की आड़ में किसी भी तरह की अवैध गतिविधि न पनपे।
राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, DOJ का यह नया रवैया आने वाले समय में बर्थ टूरिज़्म से जुड़ी बहस को और तेज कर सकता है और आव्रजन नीति को एक नई दिशा दे सकता है।
बर्थराइट सिटिजनशिप के ऐतिहासिक संदर्भ
बर्थराइट सिटिजनशिप का सिद्धांत अमेरिका के संविधान में 14वीं संशोधन के साथ वर्ष 1868 में जोड़ा गया था। इसका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद स्वतंत्र हुए गुलामों और उनके बच्चों को पूर्ण नागरिक अधिकार देना था, ताकि किसी भी राज्य या सरकार को उनकी नागरिकता पर सवाल उठाने का अधिकार न रहे। उस समय यह प्रावधान सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया।
बीते लगभग एक सौ वर्षों में अमेरिकी अदालतों ने इस सिद्धांत की कई बार व्याख्या की, लेकिन हर बार इसे संविधान की मूल भावना के अनुरूप बरकरार रखा गया। अदालतों का मानना रहा है कि जन्म के आधार पर नागरिकता देने से समाज में स्थिरता, समान अवसर और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होती है।
आज बर्थराइट सिटिजनशिप को अमेरिकी लोकतंत्र के आधारभूत अधिकारों में गिना जाता है। यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि अमेरिका में जन्म लेने वाला हर बच्चा, चाहे उसके माता-पिता की स्थिति कुछ भी हो, कानून की नजर में समान अधिकारों के साथ नागरिक माना जाए।
FAQs
1. बर्थराइट सिटिजनशिप क्या है?
यह एक संवैधानिक अधिकार है जिसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाला बच्चा स्वतः नागरिक माना जाता है।
2. सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
कोर्ट ने 6-3 से यह निर्णय दिया कि जन्म के आधार पर नागरिकता को बरकरार रखा जाए।
3. ट्रम्प ने क्या कोशिश की थी?
ट्रम्प ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया जिसे मुस्लिम देशों और अफ्रीकी मूल के बच्चों को नागरिकता से वंचित करने का प्रयास माना गया।
4. बर्थ टूरिज़्म क्या है?
यह वहां गर्भवती महिलाएँ आती हैं कि उनका बच्चा अमेरिकी नागरिक बने।
5. बर्थ टूरिज़्म कितना आम है?
विश्लेषण बताते हैं कि यह 1% से भी कम जन्म का हिस्सा है।
6. सुप्रीम कोर्ट की वोटिंग क्या थी?
फैसला 6-3 से हुआ।
7. क्या कोर्ट सभी मामलों में सोचा सहमत था?
नहीं, तीन न्यायाधीशों ने अलग तरह से विचार व्यक्त किया।
8. क्या ट्रम्प अब इसे कांग्रेस से बदल सकेंगे?
उन्होंने ऐसा सुझाव दिया है, पर यह बेहद कठिन प्रक्रिया है।
9. DOJ बर्थ टूरिज़्म पर क्या कर रहा है?
अब DOJ इसे क़ानूनी रूप से नियंत्रित करने पर काम करेगा।
10. क़ानूनी तौर पर कौन नागरिक हैं?
जो यहाँ जन्मे हैं, वे संविधान के तहत नागरिक हैं।
11. क्या बर्थराइट सिटिजनशिप को खत्म किया जा सकता है?
केवल संविधान संशोधन या व्यापक कांग्रेस समर्थन से।
12. क्या इससे अवैध आव्रजन बढ़ेगा?
कोर्ट ने इसे सीधे तौर पर प्रमाणित नहीं माना।
13. क्या फैसले से सामाजिक बहस खत्म होगी?
नहीं, यह मुद्दा अब भी राजनीतिक बहस का विषय है।